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| चित्र साभार गूगल |
एक पुरानी ग़ज़ल -
पत्रा में लग्न खूब थे
सूखे में कहीं बाढ़ में फसलें थी धान की
फिर भी अमीन लाये हैं नोटिस लगान की
पत्रा में लग्न खूब थे पंडित भी कम ने
फिर भी कुँवारी रह गयी बेटी किसान की
बच्चों की दौड़ कम हुई आँगन की मेड़ से
शहतीरें बाँट दी गईं गिरते मकान की
दिल भी दिए की लौ की तरह काँपने लगा
आमद कहीं न हो ये किसी मेहमान की
कैसे सुकूँ के गीत सुनाएंगी कोयलें
हर शाख पे निगाह है तीरो कमान की
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| चित्र साभार गूगल |
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| पात्रा /पंचांग चित्र साभार गूगल |


























